बिहार चुनाव 2025: रोजगार बना सबसे बड़ा मुद्दा |
✍️ लेखक: कृष्ण कुमार
(Inspirational Writer & Digital Creator)
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में एक मुद्दा सबसे ज़्यादा चर्चा में है — रोजगार।
हर रैली, हर भाषण, हर घोषणा में “रोजगार” शब्द गूंज रहा है। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई बेरोजगार युवाओं को साधने की कोशिश में जुटा है।
बिहार, जो वर्षों से पलायन और बेरोजगारी की समस्या से जूझता रहा है, अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। यहां की युवा पीढ़ी अब केवल वादे नहीं, वास्तविक अवसर चाहती है।
बिहार में बेरोजगारी की जमीनी हकीकत
बिहार का नाम आते ही दिमाग में सबसे पहले शिक्षा और पलायन का जिक्र आता है। राज्य की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं।
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2024 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में बेरोजगारी दर 15% से अधिक बताई गई।
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हर साल लाखों छात्र परीक्षा पास करते हैं, लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या बेहद कम होती है।
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युवाओं का एक बड़ा वर्ग दिल्ली, पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मजदूरी करने के लिए पलायन करता है।
यह स्थिति बताती है कि बिहार में बेरोजगारी केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हर घर की कहानी है।
तेजस्वी यादव का रोजगार वादा: “हर परिवार को एक नौकरी”
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने हाल ही में एक बड़ी चुनावी घोषणा की —
“अगर हमारी सरकार बनी, तो बिहार के हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी।”
उनका कहना है कि सरकार बनने के 20 दिनों के अंदर कानून लाया जाएगा, जिससे यह वादा कानूनी रूप से बाध्यकारी बन जाए।
यह वादा सीधा बिहार के करोड़ों युवाओं के दिल को छूता है।
तेजस्वी का यह ऐलान उनकी राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन गया है। उन्होंने इस घोषणा को “रोजगार क्रांति” का नाम दिया है।
क्या यह वादा व्यावहारिक है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार जैसे राज्य के लिए “हर परिवार को नौकरी” देना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
लेकिन तेजस्वी का कहना है कि वे सरकारी रिक्तियों को भरने, नए विभाग बनाने और शिक्षा-स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भर्ती की योजना रखते हैं।
नीतीश कुमार की रोजगार योजना: “1 करोड़ नौकरियां अगले 5 साल में”
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने भी युवाओं को लुभाने के लिए रोजगार को मुख्य एजेंडा बनाया है।
उन्होंने कहा है कि अगले 5 वर्षों में 1 करोड़ रोजगार के अवसर तैयार किए जाएंगे।
राज्य सरकार पहले से ही कई योजनाओं पर काम कर रही है, जैसे:
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कौशल विकास मिशन,
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उद्योग आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम,
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स्टार्टअप बिहार योजना,
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और महिला रोजगार अभियान।
हालांकि विपक्ष का तर्क है कि ये योजनाएं ज़मीन पर उतनी असरदार नहीं दिख रही हैं, जितना कागज़ों में दिखाया जा रहा है।
युवाओं की आवाज़: “अब वादे नहीं, रोजगार चाहिए”
पटना यूनिवर्सिटी के छात्र अभिषेक कहते हैं,
“हर चुनाव में रोजगार की बात होती है, लेकिन परिणाम वही पुराना। अब हमें जॉब चाहिए, भाषण नहीं।”
गया जिले की एक छात्रा प्रीति कहती हैं,
“हमने B.Ed किया, लेकिन दो साल से वैकेंसी नहीं निकली। सरकारें आती हैं, जाती हैं, पर हमारे फॉर्म अधर में रह जाते हैं।”
युवाओं की ये आवाज़ें बताती हैं कि 2025 का चुनाव भावनाओं नहीं, अवसरों पर लड़ा जाएगा।
रोजगार के नए रास्ते: सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं
आज का बिहार बदल रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और नई नीतियों ने युवाओं के लिए रोजगार के नए दरवाजे खोले हैं।
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डिजिटल मार्केटिंग और फ्रीलांसिंग:
बिहार के कई युवा अब ऑनलाइन काम करके पैसा कमा रहे हैं। छोटे शहरों में डिजिटल एजेंसियां खुल रही हैं जो वेबसाइट डिजाइन, सोशल मीडिया मार्केटिंग और कंटेंट राइटिंग जैसे काम कर रही हैं। -
एग्रो-स्टार्टअप और कृषि आधारित उद्योग:
कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़ने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। कई युवा “मशरूम कल्टीवेशन”, “ऑर्गेनिक खेती”, और “फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स” शुरू कर रहे हैं। -
टेक्निकल एजुकेशन और स्किल डेवलपमेंट:
सरकार द्वारा ITI, पॉलिटेक्निक और कोर्स-बेस्ड स्किल ट्रेनिंग की सुविधा दी जा रही है। इससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर काम मिलने की संभावना बढ़ रही है। -
डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे Tezthink Web Solutions जैसी कंपनियां
जो छोटे कारोबारों को ऑनलाइन लाकर नए रोजगार अवसर बना रही हैं। ये कंपनियां न केवल वेबसाइट बनाती हैं बल्कि युवाओं को डिजिटल स्किल सिखाकर स्वरोजगार के लिए तैयार करती हैं।
रोजगार और राजनीति: दोनों का सीधा रिश्ता
बिहार चुनावों में रोजगार सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बन गया है।
पिछले दो दशकों में जिसने रोजगार पर ज्यादा भरोसा दिलाया, वही सत्ता में पहुंचा।
2005 में नीतीश कुमार ने “सुशासन” और “विकास” का वादा करके सत्ता संभाली थी।
2020 में तेजस्वी यादव ने “10 लाख नौकरी” का नारा दिया था, जिससे उन्हें युवाओं का भारी समर्थन मिला।
अब 2025 में फिर वही मुकाबला है, लेकिन इस बार दोनों पक्षों पर वादा निभाने का दबाव है।
क्या सच में बिहार बदल रहा है?
कुछ सकारात्मक संकेत जरूर दिख रहे हैं:
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BSSC और BPSC की भर्ती परीक्षाएं अब नियमित हो रही हैं।
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निजी निवेश धीरे-धीरे बिहार की ओर बढ़ रहा है, खासकर पटना, गया, और हाजीपुर जैसे इलाकों में।
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इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता बढ़ने से छोटे व्यवसायियों के लिए नए बाजार खुले हैं।
हालांकि चुनौतियां अभी भी हैं —
भ्रष्टाचार, देरी से भर्ती प्रक्रिया, और पारदर्शिता की कमी।
निष्कर्ष: उम्मीदें अब हकीकत चाहती हैं
बिहार के चुनाव 2025 इस मायने में ऐतिहासिक होंगे कि यहां पहली बार युवाओं की नौकरी मुख्य केंद्र बन गई है।
अब जनता भावनाओं या जातिगत समीकरणों से नहीं, बल्कि भविष्य और अवसरों के आधार पर वोट करने को तैयार है।
हर नेता को अब ये समझना होगा कि “रोजगार” सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि युवाओं की जिंदगी का सवाल है।
बिहार का युवा अब कह रहा है —
“रोजगार हमारा अधिकार है, कृपा नहीं।”
अगर राजनीतिक दल इस बार सच में युवाओं को प्राथमिकता देते हैं, तो 2025 बिहार के लिए “रोजगार क्रांति” का साल साबित हो सकता है।
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