मधेपुरा की हॉट सीट पर महा संग्राम: क्या कविता कुमारी साहा तोड़ पाएंगी पुरुष प्रभुत्व की परंपरा?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का सबसे चर्चित केंद्र बन चुका है मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र, जहाँ इस बार सियासी हवा कुछ अलग बह रही है। वर्षों से इस सीट पर पुरुष उम्मीदवारों का दबदबा रहा है, लेकिन अब JDU (NDA) ने परंपरा तोड़ते हुए कविता कुमारी साहा को उम्मीदवार बनाकर बड़ा दांव खेला है।
यह कदम न केवल राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भूमिका का प्रतीक भी माना जा रहा है।
1. पुरुषों के गढ़ में महिला की दस्तक
मधेपुरा की राजनीति पर लंबे समय से पुरुष नेताओं का वर्चस्व रहा है। चाहे वह राजद के वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर यादव हों, जिन्होंने लगातार इस सीट पर कब्जा जमाए रखा है, या 2000 के दशक में उभरे युवा नेता निखिल मंडल, जिन्होंने कभी इस सीट पर मुकाबला रोमांचक बना दिया था — हमेशा पुरुष उम्मीदवारों ने ही इस क्षेत्र की चुनावी दिशा तय की है।
लेकिन इस बार कहानी बदलती दिख रही है। कविता कुमारी साहा के मैदान में उतरने से पहली बार मधेपुरा में “महिला नेतृत्व” की चर्चा तेज हो गई है।
लोग पूछ रहे हैं —
क्या यह सीट पुरुषों के दबदबे की परंपरा तोड़ पाएगी?
2. जेडीयू का बड़ा दांव: कविता कुमारी साहा
जेडीयू ने इस बार परंपरागत सोच से हटकर EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) से आने वाली कविता कुमारी साहा पर भरोसा जताया है।
पार्टी का मकसद साफ है — सामाजिक समीकरणों को साधते हुए महिला सशक्तिकरण का संदेश देना।
नीतीश कुमार लंबे समय से महिलाओं को राजनीति में आगे लाने पर जोर देते रहे हैं। पंचायतों में 50% आरक्षण से लेकर सरकारी नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी तक, जेडीयू ने हमेशा महिलाओं के समर्थन को अपनी ताकत बनाया है।
कविता साहा का नामांकन उसी सोच की अगली कड़ी है।
वह स्थानीय स्तर पर सक्रिय रही हैं, समाजसेवा और महिला सशक्तिकरण के कामों में उनका नाम पहले से चर्चा में रहा है।
3. राजद के किले की रक्षा में चंद्रशेखर यादव
दूसरी ओर, राजद के दिग्गज नेता और बिहार सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर यादव अपने गढ़ की रक्षा में जुटे हैं।
वे लगातार इस सीट से विजयी होते रहे हैं और स्थानीय स्तर पर उनकी गहरी पकड़ है।
राजद कार्यकर्ता मानते हैं कि “मधेपुरा चंद्रशेखर का किला है”।
लेकिन इस बार समीकरण कुछ अलग हैं।
क्योंकि जेडीयू के नए चेहरे और जन सुराज के प्रभाव से राजद को अपनी पुरानी रणनीति में बदलाव करना पड़ रहा है।
चंद्रशेखर यादव ने हाल में कहा था –
“मधेपुरा की जनता विकास और शिक्षा के मुद्दे पर हमें हमेशा समर्थन देती रही है। इस बार भी जनता झूठे वादों में नहीं आएगी।”
4. निखिल मंडल और असंतोष का माहौल
2000 के चुनाव में निखिल मंडल वह चेहरा बने थे जिन्होंने राजद के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश की थी।
वे उस समय युवाओं में बेहद लोकप्रिय थे। लेकिन इस बार उन्हें टिकट नहीं मिलने से उनके समर्थक खासे नाराज़ बताए जा रहे हैं।
सबसे अधिक असंतोष बोवा यादव समुदाय में देखा जा रहा है, जो निखिल मंडल को “युवा आइकन” के रूप में देखते हैं।
लोगों का कहना है कि “अगर निखिल को मौका मिलता, तो मुकाबला और भी दिलचस्प होता।”
यह असंतोष राजद के लिए सिरदर्द बन सकता है, क्योंकि यही वोट बैंक अब बिखरने के आसार में है।
5. महिला नेताओं की नाराज़गी और अंदरूनी मतभेद
जेडीयू की ओर से टिकट बंटवारे के बाद कुछ महिला कार्यकर्ता, जैसे गुड्डी देवी और अन्य स्थानीय नेत्रियां, खुलकर अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुकी हैं।
उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाली महिलाओं को मौका नहीं मिला।
ऐसे में सवाल उठता है —
क्या यह अंदरूनी मतभेद NDA के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा या कविता साहा के पक्ष में सहानुभूति पैदा करेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर पार्टी इन असंतोषों को समय रहते संभाल लेती है, तो यह महिला उम्मीदवार NDA के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकती हैं।
6. मोदी सरकार की योजनाएं और महिला सशक्तिकरण का कार्ड
कविता कुमारी साहा के प्रचार में NDA खास तौर पर महिला योजनाओं को हाइलाइट कर रहा है।
केंद्र सरकार की जीविका दीदी योजना, जिसमें सरकार 10,000 रुपये तक की सहायता सीधे बैंक खाते में भेज रही है और 2 लाख रुपये तक का सहयोग देने का वादा कर रही है, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय हो रही है।
इन योजनाओं को NDA “महिला आत्मनिर्भरता का प्रतीक” बताकर जनता तक पहुंचा रहा है।
कविता साहा के प्रचार पोस्टरों में साफ लिखा है —
“नारी सशक्त, मधेपुरा सशक्त।”
यानी NDA इस चुनाव को “महिला विकास बनाम पुरानी राजनीति” के रूप में पेश करने की कोशिश में है।
7. जन सुराज का फैक्टर — शशि कुमार का शांत पर असरदार अभियान
उनका अभियान भले शांत दिखाई दे, लेकिन उनका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
शशि कुमार युवाओं और किसानों से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बना रहे हैं।
उन्होंने हाल में कहा —
“हमारा लक्ष्य है मधेपुरा को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में आत्मनिर्भर बनाना।”
उनकी उपस्थिति इस चुनाव को त्रिकोणीय बना रही है।
अगर वोटों का विभाजन होता है, तो यह कविता साहा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
8. मधेपुरा की जनता का मूड — “अबकी बार बदलाव की बयार”
स्थानीय स्तर पर लोगों से बात करने पर यह साफ झलकता है कि इस बार जनता मुद्दा-आधारित वोटिंग की सोच में है।
किसान सिंचाई और बाजार की मांग कर रहे हैं, युवा रोजगार और शिक्षा सुधार की।
महिलाओं के बीच NDA की योजनाओं का असर दिख रहा है, लेकिन राजद का सामाजिक आधार अब भी मजबूत है।
यानी मुकाबला एकदम संतुलित है।
कविता साहा को महिलाओं और युवा वर्ग से समर्थन मिल सकता है, जबकि चंद्रशेखर यादव अपने पुराने नेटवर्क पर भरोसा कर रहे हैं।
9. क्या NDA तोड़ पाएगा राजद का गढ़?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर कविता कुमारी साहा अपने प्रचार को गांव-गांव तक ले जाती हैं और महिला मतदाताओं को प्रेरित कर पाती हैं, तो वह मधेपुरा की राजनीति में इतिहास रच सकती हैं।
लेकिन अगर राजद का वोट बैंक एकजुट रहा, तो चंद्रशेखर यादव के लिए यह सीट फिर सुरक्षित साबित हो सकती है।
वहीं, जन सुराज के शशि कुमार की भूमिका निर्णायक हो सकती है, क्योंकि उनके कारण वोटों का बंटवारा लगभग तय माना जा रहा है।
10. निष्कर्ष — परंपरा बनाम परिवर्तन का चुनाव
मधेपुरा का चुनाव 2025 एक बड़ा सवाल खड़ा करता है —
क्या महिला उम्मीदवार कविता कुमारी साहा पुरुषों के गढ़ में जीत का इतिहास लिख पाएंगी, या परंपरा एक बार फिर दोहराई जाएगी?
राजद, एनडीए और जन सुराज — तीनों ही दल पूरी ताकत से मैदान में हैं।
लेकिन जनता अब सिर्फ जाति या पार्टी नहीं, बल्कि विकास और काम की राजनीति देख रही है।
अगर कविता कुमारी साहा महिलाओं और युवाओं का भरोसा जीतने में सफल होती हैं, तो मधेपुरा इस बार एक नया इतिहास लिख सकता है।
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