6 नवंबर 2025: बिहार बोलेगा — अब बस बहुत हुआ, अब इज़्जत से जीना है
✍️ लेखक: कृष्ण कुमार | TezBreaking24 | सबसे तेज़, सबसे भरोसेमंद
जब वोट सिर्फ वोट नहीं, इज़्जत बन जाए
कभी-कभी कोई तारीख़ इतिहास नहीं बदलती, बल्कि इंसान के मन की आग बदल देती है।
6 नवंबर 2025, वही दिन है।
यह वो सुबह होगी जब बिहार थका हुआ नहीं, जागा हुआ नज़र आएगा।
इस बार का चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, सम्मान का युद्ध है।
यह उन बूढ़े हाथों की कहानी है जो अब भी राशन कार्ड की लाइन में खड़े हैं,
उन नौजवानों की आवाज़ है जो डिग्री लेकर दिल्ली-मुंबई की धूल में सपने ढूंढ रहे हैं,
और उन माताओं की आह है जिन्होंने अपने बच्चों को पेट भराने के लिए परदेस भेजा।
6 नवंबर को जब वोट डलेगा, तो सिर्फ बटन नहीं दबेगा —
हर क्लिक के साथ एक दबी हुई सच्चाई बाहर आएगी।
पहला चरण — इम्तिहान नहीं, बिहार की आत्मा की पुकार
बिहार के पहले चरण में सड़कों पर भीड़ होगी, बूथों पर कतारें लंबी होंगी,
लेकिन हर चेहरे पर एक ही सवाल लिखा होगा —
“क्या इस बार हमारा बिहार बदलेगा?”
हर गांव से आवाज़ उठ रही है —
“अब वादे नहीं, काम चाहिए।”
“अब झूठे भाषण नहीं, सच्ची राहत चाहिए।”
“अब सिर्फ वोट नहीं, इज़्जत चाहिए।”
और यही आवाज़ इस चुनाव को सबसे अलग बनाती है।
यह सिर्फ राजनीति नहीं — बिहार की आत्मा की पुकार है।
वोट — जो मिट्टी से उठकर आसमान तक जाता है
आपका वोट छोटा लगता है, लेकिन उसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है।
वह विधानसभा तक जाती है, संसद तक जाती है,
और कभी-कभी किसी गरीब के घर तक भी —
जहां कोई बच्चा सिर्फ इस भरोसे पर सोता है कि “कल कुछ अच्छा होगा।”
जब आप अपनी उंगली पर स्याही लगवाते हैं,
तो वह स्याही सिर्फ नीली नहीं होती —
वह आपकी आवाज़ का रंग होती है।
उसमें आपके संघर्ष, आपकी तकलीफ और आपकी उम्मीद घुली होती है।
“एक वोट से क्या होगा?”
यही सोच ने देश को सालों पीछे रखा है।
लेकिन अब नहीं।
अब हर वोट बिजली की तरह गूंजेगा —
जो बेईमानी की दीवारों को तोड़ देगा।
दिल की बात — सियासत से ऊपर, सच्चाई के साथ
बिहार की धरती ने बहुत कुछ देखा है।
यह वही मिट्टी है जिसने देश को नेता, विचारक और क्रांतिकारी दिए।
लेकिन अब वही धरती अपने बच्चों से पूछ रही है —
“तुमने मेरे लिए क्या किया?”
गांव के नुक्कड़ पर बूढ़े रामलाल कहते हैं,
“पहले वोट देते थे उम्मीद से, अब देते हैं मजबूरी से।”
उनकी झुर्रियों में वक्त की कहानियां लिखी हैं।
नौजवान सोनू, जिसने इंजीनियरिंग की है, कहता है —
“सरकार बदली, लेकिन मेरी ज़िंदगी नहीं।”
यह कोई हेडलाइन नहीं — हर घर की सच्चाई है।
6 नवंबर — वह दिन जब बिहार बोलेगा
सोचिए उस सुबह की जब आप हाथ में वोटर कार्ड लेकर निकलेंगे।
धूप हल्की होगी, लेकिन भीड़ भारी।
कतारों में महिलाएं, बुजुर्ग और नौजवान सब होंगे।
और वहां सिर्फ खामोशी नहीं होगी —
वहां एक मौन क्रांति होगी।
जब आप बटन दबाएंगे, वह आवाज़ सिर्फ मशीन से नहीं निकलेगी,
वह निकलेगी आपके दिल से —
“मैं बदलना चाहता हूँ।”
इस बार बिहार सिर्फ वोट नहीं देगा,
वह अपने दर्द की गिनती कराएगा।
हर स्याही लगी उंगली बोलेगी —
“अब हमें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।”
इस बार का मुद्दा — पेट, सम्मान और भविष्य
इस बार जनता के दिल में तीन ही मुद्दे हैं —
रोज़गार, शिक्षा और इज़्जत।
अब कोई जाति या धर्म से नहीं जीतेगा,
अब जो दिल जीतेगा वही जीतेगा।
युवा कह रहे हैं —
“हमें नौकरी नहीं, मौक़ा चाहिए।”
किसान कह रहे हैं —
“हमें वादे नहीं, बाज़ार चाहिए।”
महिलाएं कह रही हैं —
“हमें भीड़ में नहीं, बराबरी में जगह चाहिए।”
और जनता कह रही है —
“अब हमें भाषण नहीं, जवाब चाहिए।”
लोकतंत्र का पर्व — लेकिन आंखों में नमी के साथ
चुनाव लोकतंत्र का त्योहार कहा जाता है।
लेकिन इस बार यह त्योहार आंखों में नमी लेकर आया है।
क्योंकि हर कोई जानता है —
बदलाव आसान नहीं है, लेकिन ज़रूरी है।
हर गली में बच्चे झंडे लिए घूम रहे हैं,
हर दीवार पर पोस्टर हैं, हर चौराहे पर भाषण —
लेकिन सबसे ऊंची आवाज़ किसी मंच से नहीं,
किसी गरीब के दिल से आ रही है —
“अब हमारी बारी है।”
सोशल मीडिया नहीं, सच्चे कदमों की जरूरत
फेसबुक पर “वोट करें” पोस्ट डालना आसान है,
लेकिन असली हिम्मत उस बूथ तक जाने में है,
जहां धूप भी चुभती है और भीड़ भी थकाती है।
जो वहां खड़ा रहता है, वही असली देशभक्त है।
क्योंकि जब आप वोट देते हैं,
तो किसी पार्टी को नहीं,
अपने आने वाले कल को चुनते हैं।
बिहार की मिट्टी बोलेगी
बूथ पर लगी कतारें किसी भी भाषण से बड़ी हैं।
वो बताती हैं कि जनता अब थककर नहीं, उठकर आई है।
इस बार बिहार की मिट्टी बोलेगी —
हर कदम पर, हर बूथ पर, हर आवाज़ में।
“हम भूखे हैं, लेकिन हारे नहीं हैं।”
“हम टूटी सड़कों पर चल रहे हैं, लेकिन टूटे नहीं हैं।”
“हम गरीब हैं, लेकिन अब खामोश नहीं हैं।”
निष्कर्ष: 6 नवंबर को बिहार तय करेगा अपना कल
यह चुनाव किसी पार्टी का नहीं,
यह चुनाव हर उस इंसान का है जिसने चुपचाप अन्याय सहा,
हर उस मां का है जिसने अपने बेटे को परदेस भेजा,
हर उस युवा का है जिसने सपना देखा लेकिन व्यवस्था ने तोड़ दिया।
6 नवंबर को जब आप बूथ जाएंगे, याद रखिए —
आप अकेले नहीं हैं।
आपके साथ करोड़ों दिल धड़क रहे हैं।
हर दिल कह रहा है —
“अब वक्त आ गया है, अब बिहार अपनी तकदीर खुद लिखेगा।”
तो जाइए, गर्व से वोट दीजिए।
क्योंकि इस बार यह सिर्फ लोकतंत्र नहीं —
यह बिहार की आत्मा की पुकार है।
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