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शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

क्यों हम अपने माँ-बाप की आख़िरी ख्वाहिश भी नहीं सुन पाते? — एक सच्चाई जो हर दिल को झकझोर देगी

 क्यों हम अपने माँ-बाप की आख़िरी ख्वाहिश भी नहीं सुन पाते?

7 नवंबर 2025 

✍️ लेखक: कृष्ण कुमार TezBreaking24 | सबसे तेज़, सबसे भरोसेमंद

कभी सोचा है — वो जो हमें बोलना सिखाते हैं, एक दिन खामोश हो जाते हैं।
वो जो हर सुबह हमारे लिए चाय बनाते हैं, एक दिन खुद पानी मांगने से डरते हैं।
वो जो बचपन में हमारी हर छोटी ज़िद पूरी करते थे, वही माँ-बाप बुढ़ापे में एक दवा के लिए सोचते हैं कि “बेटा परेशान न हो जाए।”

हम सब अपनी ज़िंदगी की दौड़ में इतने उलझ गए हैं कि अब हमें फुर्सत नहीं कि माँ-बाप की आँखों में झाँककर पूछें — “आप खुश हैं न?”


माँ-बाप की खामोशी सबसे भारी होती है

माँ-बाप कभी शिकायत नहीं करते।
वो बस अपने कमरे में बैठे रहते हैं — एक पुराना फोटो एलबम खोलकर मुस्कुराते हैं, जिसमें उनका छोटा बेटा स्कूल यूनिफॉर्म में दिखता है, या बेटी पहली बार साइकिल चला रही होती है।
उन्हें उस वक्त का हर पल याद रहता है जब उनके बच्चे उनके पास थे।

लेकिन आज, बच्चे अपने-अपने कमरों में, अपनी-अपनी दुनिया में खो गए हैं — फोन की स्क्रीन के पीछे, सोशल मीडिया की चमक के पीछे, या उस नौकरी के पीछे जो शायद दिल में सुकून नहीं देती।


उनकी आख़िरी ख्वाहिश — बस थोड़ा वक्त

आप यकीन मानिए, माँ-बाप को कुछ नहीं चाहिए।
ना पैसा, ना गाड़ी, ना घर।
उन्हें बस एक “साथ” चाहिए।
वो चाहते हैं कि हम बैठकर थोड़ी देर उनकी बातें सुन लें, उनका हाल पूछ लें।

कई माँ-बाप अपने बच्चों से मिलने की उम्मीद में दरवाज़े की ओर देखते रहते हैं, लेकिन बच्चों के पास “टाइम नहीं” होता।
और जब एक दिन फोन आता है — “अम्मा चली गईं…”
तब वो वक्त लौटकर नहीं आता।


पछतावे की वो रातें जो चैन नहीं लेने देतीं

जब माँ-बाप चले जाते हैं, तब हर वो पल याद आता है जब हमने उनकी बात टाल दी थी।
“अरे माँ, अभी ऑफिस कॉल पर हूँ।”
“पापा, बाद में बात करते हैं न।”
“अभी टाइम नहीं है…”

ये तीन शब्द — अभी टाइम नहीं है — शायद सबसे भारी बोझ बन जाते हैं, जब माँ-बाप अब इस दुनिया में नहीं होते।
तब समझ आता है, जिनके पास हम थे, वही सबसे कीमती थे।


माँ की खामोश दुआ और बाप का अनकहा गर्व

माँ हमेशा कहती है — “तू खा ले बेटा, मुझे भूख नहीं।”
लेकिन वो खुद रात में रोटी का टुकड़ा पानी में भिगोकर खा लेती है।

पिता बोलते नहीं, लेकिन हर खर्चे से पहले सोचते हैं कि “बच्चों के लिए बचा लूं।”
वो खुद की ज़रूरतों को कुर्बान कर देते हैं ताकि हमें एक बेहतर ज़िंदगी मिल सके।
पर जब वही पिता बुजुर्ग होते हैं, तो हम उनके खर्चे को “बोझ” समझने लगते हैं।

क्या यही रिश्ता था जो उन्होंने इतना प्यार से बनाया था?


घर वही रहता है, बस आवाज़ें बदल जाती हैं

बचपन में वो घर हँसी से गूंजता था।
माँ की रसोई की खुशबू, पापा की साइकिल की घंटी, और बच्चों की खिलखिलाहट…
आज सब कुछ है — बस वो माहौल नहीं।

अब वही घर साइलेंट है।
घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है, माँ के खाँसने की आवाज़ आती है, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं।
वो खामोशी घर की दीवारों में समा जाती है — और फिर एक दिन वो भी टूट जाती हैं।


वक़्त निकल गया, लेकिन एहसास बाकी है

माँ-बाप के जाने के बाद, उनके बिस्तर को कोई नहीं छूता।
उनके कपड़े अलमारी में वैसे ही रखे रहते हैं —
वो गंध, वो एहसास, सब जस का तस।
कभी-कभी हम जाकर वो कपड़े सूँघते हैं, जैसे उनसे बात कर रहे हों।
वो ममता, वो दुलार, अब बस यादों में रह गया है।

कितनी बार हम सोचते हैं, “काश उस दिन थोड़ी देर और बैठ जाता…”
पर “काश” अब बस एक दर्द है जो कभी नहीं मिटता।


अब भी वक्त है… सुन लो उनकी खामोशियाँ

अगर तुम्हारे माँ-बाप ज़िंदा हैं, तो यकीन मानो — तुम इस दुनिया के सबसे अमीर इंसान हो।
उनके पास जाओ, उनसे बात करो, उनके साथ चाय पियो।
वो बातें दोहराओ जो बचपन में किया करते थे।

वो अब भी वही हैं — बस थोड़े बूढ़े हो गए हैं, थोड़े थक गए हैं।
लेकिन तुम्हारे लिए उनका प्यार आज भी उतना ही सच्चा है।


अंत में…

जब हम छोटे थे, उन्होंने हमें संभाला।
अब जब वो कमजोर हैं, हमारी बारी है उन्हें संभालने की।
क्योंकि एक दिन ये सब खत्म हो जाएगा —
वो आवाज़ें, वो सलाहें, वो प्यार… सब।

और तब रह जाएगी बस एक तस्वीर,
जिसे देखकर दिल कहेगा —
“माँ, पापा… काश थोड़ा और वक्त मिल जाता।”

✍️ लेखक: कृष्ण कुमार 


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