क्यों बिगड़ रहे हैं गाँव-मोहल्ले के बच्चे? कौन जिम्मेदार है—समाज, माता-पिता या बदलता दौर?
✍️लेखक: कृष्ण कुमार | TezBreaking24 |
ये सिर्फ एक गाँव या एक जिले की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश के ग्रामीण समाज की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।
कहाँ खो गए वो संस्कार, वो डर, वो मर्यादा?
एक समय था जब बच्चे अपने पिता या किसी बुजुर्ग के सामने ऊँची आवाज़ में बोलने की हिम्मत नहीं करते थे।
रात को 10 बजे तक अगर कोई घर नहीं लौटता था, तो पूरा परिवार परेशान हो जाता था।
लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि बच्चे रात के 12 बजे तक बाहर घूमते हैं, और माता-पिता कुछ कह भी दें तो उल्टा जवाब मिलता है—कभी झगड़ा, कभी धमकी।
आज स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई माता-पिता अपने ही बच्चों से डरने लगे हैं।
उन्हें यह भय सताता है कि कहीं डांटने पर उनका बच्चा कोई गलत कदम न उठा ले।
कई घरों में ये डर अब “चुप्पी” का रूप ले चुका है, जहाँ माता-पिता केवल सहम कर रह जाते हैं।
क्या शिक्षा की कमी इसका कारण है?
कई लोग कहते हैं—“शिक्षा नहीं है, इसलिए बच्चे बिगड़ रहे हैं।”
लेकिन सच्चाई यह है कि आज का बच्चा पढ़ा-लिखा होते हुए भी संस्कारों से दूर होता जा रहा है।
विद्यालयों में किताबें तो सिखाई जाती हैं, लेकिन जीवन-मूल्य नहीं।
घर में मोबाइल मिल जाता है, लेकिन माँ-बाप के पास समय नहीं।
टीवी और सोशल मीडिया ने बच्चों की सोच को जिस दिशा में मोड़ा है, वो बेहद चिंताजनक है।
माता-पिता की लापरवाही या मजबूरी?
हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए अच्छा ही चाहते हैं, लेकिन कई बार परिस्थितियाँ ऐसा नहीं होने देतीं।
कुछ माता-पिता मजदूरी में व्यस्त रहते हैं, कुछ अपने काम-धंधे में।
बच्चों को समय नहीं मिल पाता, और इसी बीच वे गलत संगति में पड़ जाते हैं।
पहले बच्चे गलती करते थे तो समाज के बड़े लोग उन्हें समझाते थे, लेकिन अब अगर कोई कुछ कह दे तो “देख लेने” की धमकी तक मिलती है।
यह डरावनी सोच इस बात की निशानी है कि हमारे समाज में अनुशासन और आदर की भावना खत्म होती जा रही है।
नशे का फैलता जाल – हर नुक्कड़ पर ज़हर
गाँव के हर छोटे से छोटे दुकान पर सिगरेट, गुटखा, तंबाकू और कोडीन जैसी खतरनाक चीज़ें खुलेआम बिक रही हैं।
नाबालिग बच्चे बिना किसी रोक-टोक के ये सब खरीद लेते हैं।
सरकार के कानून सिर्फ कागज़ पर हैं, ज़मीन पर कोई अमल नहीं।
हाल ही में एक घटना ने सबको हिला दिया — एक दुकानदार ने जब नाबालिग लड़के को सिगरेट देने से मना किया, तो उस पर गोली चला दी गई।
सोचिए, ये वो पीढ़ी है जो अभी सही-गलत को पूरी तरह समझ भी नहीं पाई है, लेकिन हिंसा की हद पार कर चुकी है।
क्या यही है हमारे समाज का भविष्य?
आज का युवा वर्ग तकनीक में तेज है, लेकिन मानसिक रूप से पहले से ज्यादा अस्थिर।
10 साल पहले जो डर “बाहरी दुनिया” से था, वो आज “अपने घर और मोहल्ले” से है।
हम अब अपने ही गाँवों में सुरक्षित महसूस नहीं करते।
जहाँ कभी बुजुर्गों का आशीर्वाद और सम्मान था, वहाँ अब डर, नशा और अपराध की छाया है।
अगर यही चलता रहा तो आने वाले 10 सालों में स्थिति और भी भयानक हो सकती है।
हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो खुद को भी नुकसान पहुँचा सकती है और समाज को भी।
समाधान क्या है?
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संस्कार की पुनर्स्थापना:
शिक्षा के साथ संस्कार देना जरूरी है। घर में बड़ों का सम्मान, समय पर उठना-बैठना, और माता-पिता की बात सुनना—ये सब बच्चों को सिखाना ही होगा। -
परिवार का साथ:
बच्चों के साथ रोज कुछ समय बिताना चाहिए। उनकी बातें सुनिए, उनके दोस्त कौन हैं ये जानिए।
जब बच्चा महसूस करेगा कि घर में उसे समझने वाला है, तो वो बाहर गलत संगत नहीं ढूंढेगा। -
समाज की भागीदारी:
गाँव के लोग मिलकर ऐसी दुकानों पर रोक लगाएं जो नाबालिगों को नशे की चीजें बेचते हैं।
एक सामूहिक पहल जरूरी है। -
सरकारी सख्ती:
प्रशासन को छोटे-छोटे कस्बों तक निगरानी रखनी चाहिए।
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर सत्र आयोजित किए जाएं। -
मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी:
युवाओं को सकारात्मक दिशा देने वाले कंटेंट को बढ़ावा देना चाहिए, न कि हिंसा और फिजूल लाइफस्टाइल को।
निष्कर्ष – अभी भी वक्त है
हम अगर आज नहीं जागे, तो आने वाला समय हमें माफ नहीं करेगा।
बच्चों को रोकना, समझाना और सही दिशा में ले जाना सिर्फ माता-पिता का नहीं, पूरे समाज का कर्तव्य है।
संस्कार, डर और अनुशासन—यही वो तीन नींव हैं जिन पर मजबूत समाज बनता है।
हमारे गाँव, हमारे मोहल्ले तभी फिर से सुरक्षित होंगे जब हर माता-पिता अपने बच्चे के साथ दोस्त भी बने और शिक्षक भी।
युवाओं को समझना होगा कि “नशे में आज़ादी नहीं, विनाश है।”
अब वक्त है कि हम सब मिलकर कहें —
“हमारी पीढ़ी नहीं, हमारी सोच बदलेगी — तभी देश बदलेगा।”
https://www.tezbreaking24.in/2025/10/bharose-ke-naam-par-thagi-masoom-dukanadar-nishana.html



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