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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

मुझे गर्व है कि मैं किसान हूँ, पर कब तक सहूँ ये दर्द? किसानों की व्यथा और सच्चाई

 🌱 हर खेत की मिट्टी में दर्द है, पर आवाज़ कोई नहीं सुनता

 24 अक्टूबर 2025 |

✍️रिपोर्ट: कृष्ण कुमार | TezBreaking24 |

 “मुझे गर्व है कि मैं किसान हूँ... लेकिन अब ये गर्व दर्द बन चुका है।”

हर किसान की कहानी लगभग एक जैसी है — फसल उगाता है, पर उसकी कीमत तय कोई और करता हैखाद-बीज के लिए लाइन में लगता है, पर मिलता है तो महंगे दामों पर या डुप्लिकेट माल। सवाल यह है कि आखिर किसान कब तक यूं ही संघर्ष करता रहेगा?


आज गाँव-गाँव में एक ही दर्द सुनाई देता है —

“हमारी मेहनत की कोई कद्र नहीं, और हमारी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं।”


 असली समस्या: “उचित मूल्य और समय पर संसाधन की कमी”

किसान जब खेत में मेहनत करता है, तो उम्मीद करता है कि उसकी फसल की कीमत न्यायपूर्ण होगी। पर होता इसका उल्टा —
मंडी में दलाल, नीतियों में राजनीति, और अधिकारीयों की बेरुखी मिलकर किसान की उम्मीदों को कुचल देती है।

आज भी गाँवों में किसान कहता है —

“सिचाई का इंतजाम नहीं, खाद का दाम आसमान पर, बीज नकली... फिर भी हमें ही दोषी कहा जाता है।”


 खाद और बीज की लूट: “खरीदो तो मजबूरी, नहीं लो तो फसल बर्बाद”

आज उर्वरक की असली कीमत ₹262 है, लेकिन बाजार में वही खाद ₹350 से ₹400 में बिकती है।
दुकानदार कहता है —

“अगर यूरिया चाहिए तो साथ में दूसरा प्रोडक्ट भी लेना होगा।”

यह कैसा सिस्टम है, जहाँ किसान मजबूर है और व्यापारी मुनाफाखोर?
क्या कोई अधिकारी इनकी सुनता है? शायद नहीं।
क्योंकि नेताओं के लिए तो एक फोन पर सब कुछ तैयार रहता है —
खाद भी, बीज भी और सुविधा भी।


 गाँव का सच: “छोटे नेता बने ठेकेदार, किसान बन गया ग्राहक”

आज ग्रामीण स्तर पर जो भी नेता या जनप्रतिनिधि हैं, वे खुद को “मुख्यमंत्री से कम” नहीं समझते।
सत्ता का स्वाद चखते ही वो भूल जाते हैं कि किसानों ने ही उन्हें चुना था
सरकारी फंड उनके लिए “लॉटरी” बन जाता है, और
गरीब किसान सिर्फ दर्शक बन जाता है


 जब खेत सूखता है तो दिल भी सूख जाता है

“सिचाई नहीं, बिजली नहीं, बारिश नहीं... फिर भी खेत में उम्मीद बो देते हैं किसान।”
पर जब खेत सूख जाता है, तो उम्मीद भी मर जाती है।
और जब फसल नष्ट होती है, तो कर्ज का बोझ और बढ़ जाता है।

यही वजह है कि आज देश में हर महीने सैकड़ों किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं।
क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद यही आख़िरी रास्ता है।


 समाधान कहाँ है?

कृषि नीति की फाइलों में? या सरकार की बैठकों में?

सवाल ये नहीं कि किसान क्या कर रहा है,
सवाल ये है कि सरकार क्या कर रही है?

  • क्या फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सच में किसानों तक पहुँच रहा है?

  • क्या खाद-बीज की ब्लैक मार्केटिंग पर कोई रोक लगी है?

  • क्या ग्रामीण इलाकों में कृषि सलाह केंद्र वास्तव में काम कर रहे हैं?

अगर नहीं — तो ये समस्या सिर्फ “खेती” की नहीं, व्यवस्था की असफलता है।


 किसान का सवाल देश से...

“क्या हमें जीने का हक नहीं?”
“क्या आत्महत्या ही आख़िरी रास्ता है?”
“क्या कोई हमारी आवाज़ सुनेगा?”

ये सवाल सिर्फ एक किसान के नहीं,
हर गाँव, हर खेत, और हर दिल की आवाज़ हैं।


 निष्कर्ष: “किसान सिर्फ उत्पादक नहीं, बल्कि भारत की रीढ़ है”

जब तक खेत हरे रहेंगे, देश जिंदा रहेगा।
पर अगर किसान थक गया, टूट गया, तो
देश की आत्मा भी सूख जाएगी।

अब वक्त है कि सरकार, समाज और सिस्टम —
तीनों मिलकर इस दर्द को समझें, न कि अनदेखा करें।



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