गम्हरिया के बाजारों में नई चिंता — भरोसे के नाम पर अपराध का फैलता जाल
बिहार के मधेपुरा जिले के गम्हरिया प्रखंड में हाल के महीनों में एक अजीब सा चलन सामने आ रहा है। बाजारों में कुछ ऐसे युवा देखे जा रहे हैं जो न तो स्थायी रूप से काम करते हैं और न ही किसी पेशे में रुचि दिखाते हैं। उनका असली मकसद धीरे-धीरे दुकानदारों और ग्राहकों के बीच भरोसा जीतना और फिर उस भरोसे का गलत इस्तेमाल करना है।
कैसे बढ़ता है विश्वास — अपराध की कहानी की पहली सीढ़ी
इन युवाओं का तरीका बेहद चालाकी से भरा होता है। वे खुद सीधे मदद नहीं करते, बल्कि किसी न किसी ग्राहक को साथ लाते हैं।
वो दुकानदार से कहते हैं — “भैया, मेरे जानने वाला है, इससे खरीद लीजिए।”
दुकानदार को लगता है कि यह लड़का तो उसके लिए ग्राहक ला रहा है, यानि "वफादार" है।
धीरे-धीरे वे दुकान पर बार-बार आने लगते हैं — कभी किसी चीज़ का दाम पूछने, कभी किसी ऑर्डर की सिफारिश करने।
दुकानदार यह मान लेता है कि यह “भरोसेमंद ग्राहक” है।
लेकिन यही भरोसा एक दिन सबसे बड़ा धोखा बन जाता है।
मौका मिलते ही वही युवा सामान या पैसा लेकर गायब हो जाते हैं।
कई दुकानदारों को तो यह भी नहीं पता चलता कि नुकसान कब और कैसे हुआ।
नशे की लत — अपराध की जड़
गम्हरिया प्रखंड के कई स्थानीय लोगों का कहना है कि इन अपराधों की असली वजह है नशे की लत और उसकी आसान उपलब्धता।
गांव-गांव में कोडीनयुक्त कफ सिरप, सिडेक्सिन जैसी दवाइयां और अन्य नशीले पदार्थ खुलेआम बिक रहे हैं।
कई मेडिकल दुकानों पर बिना पर्ची के सिरप और टैबलेट मिल जाती हैं।
इन युवाओं के पास काम नहीं है, जेब में पैसे नहीं हैं, लेकिन नशा चाहिए।
फिर चाहे पैसे ठगी, चोरी, या झूठे बहाने से क्यों न लाने पड़ें।
धीरे-धीरे नशा उनकी सोच पर हावी हो जाता है।
वो सही और गलत का अंतर भूल जाते हैं, और यहीं से आपराधिक मानसिकता का जन्म होता है।
समाज की चुप्पी — अपराधियों की ताकत
कई दुकानदार कहते हैं, “क्या ज़रूरत है बोलने की, कहीं झगड़ा न हो जाए।”
यही डर अपराधियों को और बढ़ावा देता है।
जब समाज चुप रहता है, तो अपराधी निडर हो जाते हैं।
वो जानते हैं कि कोई उन्हें रोकने वाला नहीं है।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं, “आज अगर इन लड़कों पर लगाम नहीं लगी, तो कल ये बड़े अपराधी बन जाएंगे।”
यह चेतावनी अब सिर्फ कहने भर की बात नहीं रह गई है —
अब यह वास्तविकता बनती जा रही है।
किसकी ज़िम्मेदारी है यह बिगड़ता हुआ भविष्य?
सवाल यही है — इन युवाओं के इस पतन के लिए दोषी कौन है?
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माता-पिता, जिन्होंने समय पर बच्चों से बात नहीं की?
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बेरोज़गारी, जिसने युवाओं को भटकने पर मजबूर किया?
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या वो नशे का अवैध कारोबार, जिसने इन्हें अंधे रास्ते पर धकेल दिया?
शायद जवाब इन तीनों में कहीं बीच में है।
क्योंकि जब घर से संवाद टूटता है, समाज से डर मिटता है, और कानून से डर खत्म होता है —
तो अपराध खुद-ब-खुद जन्म लेने लगता है।
कानून और प्रशासन की भूमिका
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार पुलिस को जानकारी दी गई, लेकिन कार्रवाई सीमित रही।
गांवों में अब भी नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री जारी है।
जरूरत है कि प्रशासन सख्त अभियान चलाए, मेडिकल दुकानों की निगरानी करे और
इन पदार्थों की सप्लाई चेन को पूरी तरह तोड़े।
साथ ही पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान शुरू किया जाए ताकि लोग डरने के बजाय रिपोर्ट करने की हिम्मत करें।
एक मज़बूत सामुदायिक पहल से ही इस अपराधी मानसिकता पर अंकुश लगाया जा सकता है।
समाज के लिए चेतावनी और उम्मीद
गम्हरिया की गलियों में यह समस्या सिर्फ “कुछ युवाओं” तक सीमित नहीं है।
यह पूरा सामाजिक ढांचा हिला रही है।
आज जो लड़के ठगी कर रहे हैं, कल वही हिंसा या अपहरण जैसे अपराधों में लिप्त हो सकते हैं।
लेकिन उम्मीद अब भी है —
अगर समाज समय रहते आवाज़ उठाए, माता-पिता संवाद बढ़ाएँ, और प्रशासन अपनी भूमिका निभाए,
तो इस बर्बादी की राह को पलटा जा सकता है।
क्या करें — व्यावहारिक उपाय
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सावधान रहें: किसी पर जल्दी भरोसा न करें, चाहे वह रोज़ दुकान पर आने वाला ग्राहक ही क्यों न हो।
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सूचना साझा करें: किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत पुलिस या पंचायत को दें।
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नशा मुक्त अभियान में भाग लें: स्कूलों और गांवों में नियमित नशा मुक्ति जागरूकता शिविर हों।
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बेरोजगार युवाओं के लिए प्रशिक्षण: स्थानीय प्रशासन को छोटे व्यवसाय और रोजगार योजनाएँ बढ़ानी चाहिए।
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माता-पिता की भूमिका: बच्चों पर नजर रखें, उनके मित्र और दिनचर्या जानें, और बदलाव दिखे तो संवाद करें।
निष्कर्ष
गम्हरिया की यह कहानी सिर्फ एक इलाके की नहीं, बल्कि हर उस जगह की है जहां बेरोज़गारी, नशा और चुप्पी साथ मिलकर अपराध को जन्म देते हैं।
आज जरुरत है जागरूकता, एकता और साहस की — ताकि कोई भी युवा नशे और अपराध के रास्ते पर न जाए।
अगर आपने भी अपने इलाके में ऐसे गिरोह या संदिग्ध गतिविधि देखी है, तो चुप न रहें।
अपने थाने, पंचायत या स्थानीय मीडिया को जानकारी दें।
आपकी एक सूचना कई लोगों की ज़िंदगी बचा सकती है।
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