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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

बिहार के किसान की आवाज़ | “हम मेहनत करते हैं, पर हक नहीं मिलता” — मधेपुरा के कृष्ण कुमार की भावुक अपील |

बिहार के किसानों की पुकार: “सुनिए हमारी आवाज़, अब हम भी इज़्ज़त से जीना चाहते हैं”

      मधेपुरा, 29 अक्टूबर 2025:

✍️रिपोर्ट: कृष्ण कुमार | TezBreaking24 |

बिहार की मिट्टी में मेहनत की खुशबू है, लेकिन आज वही मिट्टी किसानों की आंखों में दर्द बनकर उतर रही है। मैं कृष्ण कुमार, बिहार के एक छोटे से गाँव का किसान हूँ। आज यह लेख मैं एक पत्रकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक दर्द से भरे किसान के बेटे के रूप में लिख रहा हूँ।

बिहार की मिट्टी में मेहनत है, पसीना है, पर हक नहीं।

हर साल सरकारें किसानों के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन योजनाओं का 10% लाभ भी आम किसान तक नहीं पहुँच पाता।
हर दफ्तर, हर दफ्तर का क्लर्क, हर ऑफिस की मेज — सब पर रिश्वत की धूल जमी है। बिना पैसे के कोई काम नहीं होता। किसान का दुख यह है कि उसके पास मेहनत है, पर उसके हक की सुनवाई नहीं।

मधेपुरा जिले के गांव टोकसिहपुर, गम्हरिया के रहने वाले कृष्ण कुमार, एक साधारण किसान परिवार से हैं।
कृष्ण पिछले दो साल से लगातार एक ऐसे स्टार्टअप पर काम कर रहे हैं जो किसानों के लिए सस्ता, असली खाद और बीज सीधे खेत तक पहुंचाने की व्यवस्था लाना चाहता है — ताकि बीच के बिचौलियों की लूट खत्म हो सके और किसान को उसका हक मिले।

पर अफसोस की बात यह है कि इतने नेक और दूरदर्शी काम के लिए उन्हें आज तक किसी का सहयोग नहीं मिला
अगर कोई परियोजना शराब, तंबाकू या चमकदार मुनाफे से जुड़ी हो, तो हर कोई उसमें पैसा लगाने को तैयार होता है।
लेकिन जब बात किसान के भले की आती है, तो समाज चुप हो जाता है।

कृष्ण कुमार कहते हैं —

“हर कोई ऑर्गेनिक सब्जी चाहता है, ऑर्गेनिक अनाज चाहता है, पर कोई यह नहीं देखना चाहता कि ऑर्गेनिक खेती करने वाला किसान किन मुश्किलों से गुजर रहा है।
सरकारें कहती हैं किसानों की आय दोगुनी होगी, पर कैसे? जब खाद और बीज की कीमत आसमान छू रही है, जब हर सीजन में किसान को पुराने मुनाफे का आधा भी नहीं मिलता।”

आज बिहार का किसान उस मोड़ पर खड़ा है जहां उसे यह सोचना पड़ रहा है —


क्या यही हमारी नियति है?
धान बेचकर गेहूं उगाना, फिर गेहूं बेचकर धान बोना —
क्या इसी चक्र में जिंदगी गुजर जाएगी?
क्या किसान का कोई वजूद नहीं?
क्या हम इसी के लिए पैदा हुए हैं?

कृष्ण कहते हैं कि अगर व्यवस्था ईमानदार हो जाए, तो किसान भी शान से जी सकता है।

“हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां किसान कभी खाद-बीज के लिए मोहताज न हो।
जहां हर पंचायत में सरकार यह सुनिश्चित करे कि हर किसान को समय पर, उचित कीमत पर, असली खाद और बीज मिले।”

वे यह भी कहते हैं कि सरकार चाहे तो एक ऐसा प्लेटफॉर्म लॉन्च कर सकती है जिससे किसान को सीधे कृषि-सामग्री मिले —
बिचौलियों की जेब नहीं, बल्कि किसान के खेत तक सरकारी सहायता पहुंचे।

कृष्ण कुमार का यह सपना किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण भारत की उस उम्मीद का प्रतीक है जो आज भी जिंदा है —
“किसान अगर उठेगा, तो देश उठेगा।”

पर सच्चाई यह है कि
कृष्ण जैसे हजारों युवा किसान आज भी अपनी आवाज़ उठाने की हिम्मत तो रखते हैं,
लेकिन साथ देने वाला कोई नहीं मिलता।

“मैं बिहार के मधेपुरा जिले के एक छोटे से गांव टोकसिहपुर का रहने वाला हूं,”
कृष्ण बताते हैं,
“मैं दो साल से लगातार किसानों के हित के लिए एक ग्रामीण नवाचार परियोजना पर काम कर रहा हूं।
रोडमैप तैयार है, ज़मीन पर काम शुरू करने की योजना भी है, लेकिन फंडिंग नहीं मिल रही।
अगर यही मेहनत किसी शराब या मनोरंजन प्रोजेक्ट में होती, तो कई निवेशक लाइन में होते।
लेकिन किसान की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।”

कृष्ण की यह बात सुनकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सोच में पड़ जाएगा —
क्या हमारे समाज में अब भी खेती का सम्मान है?
हम सब किसान से खाना लेते हैं, पर क्या कभी किसान की भूख देखी है?

कृष्ण कुमार का सपना सिर्फ अपनी जिंदगी सुधारना नहीं है।
वह एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहते हैं जिसमें

  • किसान को खाद-बीज की किल्लत न हो,

  • असली उत्पाद सीधा किसान तक पहुंचे,

  • और हर ब्लॉक व पंचायत में पारदर्शी कृषि सहायता केंद्र स्थापित हो।

उनका विश्वास है कि अगर सही दिशा और सहयोग मिले, तो बिहार के किसान फिर से अपनी पहचान बना सकते हैं।

कृष्ण की अपील साफ है —

“मैं किसी राजनीतिक दल से नहीं, किसानों से जुड़ी बात कर रहा हूं।
मैं चाहता हूं कि सरकारें सिर्फ योजना पास न करें,
बल्कि यह सुनिश्चित करें कि किसान तक उसका फायदा पहुंचे।
आज नहीं तो कल, किसान की आवाज़ को सुना जाएगा —
लेकिन मैं चाहता हूं कि यह बदलाव मेरी पीढ़ी में ही शुरू हो।”


एक किसान की अपील सरकार और समाज से

कृष्ण कुमार की यह आवाज़ सिर्फ मधेपुरा की नहीं, बल्कि हर उस किसान की है जो आज भी उम्मीद और संघर्ष के बीच जी रहा है।
अब वक्त आ गया है कि सरकारें, संस्थान, और समाज — सब मिलकर किसान के लिए सच्चा बदलाव लाएं।

क्योंकि अगर किसान नहीं रहेगा,
तो ना खेत रहेंगे,
ना अनाज,
ना रोटी।


क्या आप भी कृष्ण कुमार जैसे किसानों की आवाज़ बनना चाहते हैं?

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