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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

–40 अंक पर डॉक्टर बनने की इजाजत: क्या अब हमारी जिंदगी सिर्फ किस्मत के भरोसे?

 आम आदमी के स्वास्थ्य से हो रहा सबसे बड़ा समझौता

✍️लेखक कृष्ण कुमार | TezBreaking24 | मधेपुरा, बिहार

आज देश के करोड़ों आम लोगों के मन में एक डर बैठ गया है।
डर इस बात का कि कहीं इलाज के नाम पर अब प्रयोग तो नहीं होने लगेगा?
कहीं अस्पताल अब भरोसे की जगह डर का नाम तो नहीं बन जाएगा?

–40 अंक पर डॉक्टर बनने की इजाजत

कारण है एक ऐसा फैसला, जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

NEET-PG जैसी कठिन मेडिकल परीक्षा में अब –40 अंक पाने वाला छात्र भी काउंसलिंग के योग्य माना जा रहा है।
यानि जो छात्र शून्य से भी कम अंक लाया, वह भी अब डॉक्टर बनने की कतार में खड़ा हो सकता है।

यह सिर्फ शिक्षा से जुड़ा मामला नहीं है।
यह सीधे-सीधे हर नागरिक की जान से जुड़ा सवाल है।


आम आदमी का सबसे बड़ा डर: “कहीं गलत इलाज न हो जाए”

गरीब हो या मध्यम वर्ग,
जब कोई बीमार होता है तो आखिरी उम्मीद डॉक्टर ही होता है।
मां अपने बच्चे को गोद में उठाकर अस्पताल जाती है और कहती है
“डॉक्टर साहब, बस मेरे बच्चे को बचा लीजिए।”

लेकिन अगर उसी डॉक्टर को खुद पूरी ट्रेनिंग न मिली हो,
अगर वह किताबों में ही कमजोर रहा हो,
अगर वह प्रैक्टिकल फैसलों में गड़बड़ कर दे…

तो उस मां की उम्मीद किससे जाएगी?

आज सवाल यह नहीं है कि कितने छात्र पास होंगे,
सवाल यह है कि कितने मरीज सुरक्षित रहेंगे।


 100 में 100 लाने वाले पीछे, –40 वाले आगे?

देश में हजारों ऐसे छात्र हैं जो सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं।
कोचिंग, टेस्ट सीरीज, किताबें, नींद सब त्याग देते हैं।
कई बार परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाता है।

और जब वही छात्र अच्छा स्कोर लाकर भी सीट से वंचित रह जाए
और दूसरी ओर बहुत कम नंबर वाला छात्र दाखिला पा जाए…

तो यह सिर्फ अन्याय नहीं,
यह पूरी प्रतिभा प्रणाली को तोड़ने जैसा है।

इससे साफ संदेश जाता है कि:
मेहनत की कोई गारंटी नहीं,
योग्यता की कोई कीमत नहीं।

ऐसे में टैलेंटेड युवा या तो विदेश चले जाएंगे
या मेडिकल जैसे प्रोफेशन से ही मुंह मोड़ लेंगे।


डॉक्टर भगवान क्यों कहे जाते हैं?

हमारे देश में डॉक्टर को भगवान कहा जाता है
क्योंकि जब सब रास्ते बंद हो जाते हैं,
तब डॉक्टर ही आखिरी सहारा होता है।

लेकिन भगवान बनने के लिए सिर्फ सफेद कोट नहीं,
गहरी समझ, जिम्मेदारी और निर्णय क्षमता चाहिए।

ऑपरेशन थिएटर में खड़े होकर
एक सेकंड में फैसला लेना पड़ता है।
ICU में हर छोटी गलती मौत का कारण बन सकती है।

अगर मेडिकल शिक्षा में ही ढील दी जाएगी,
तो आगे चलकर उस डॉक्टर से
कैसे परफेक्ट फैसले की उम्मीद की जा सकती है?


 सरकार का तर्क: सीटें खाली हैं

सरकार और मेडिकल काउंसिल का कहना है कि
हजारों PG सीटें खाली रह जाती हैं,
इसीलिए कट-ऑफ घटाना जरूरी था।

लेकिन सवाल यह है:
क्या सिर्फ सीट भरना मकसद होना चाहिए
या अच्छे डॉक्टर तैयार करना?

अगर कल को कोई कहे कि
पायलट की भी कमी है,
तो क्या बिना ट्रेनिंग के विमान उड़ाने देंगे?

मेडिकल ऐसा क्षेत्र है
जहां एक गलती की कीमत जान से चुकानी पड़ती है।

इसलिए यहां क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी जरूरी है।


 आरक्षण और रियायत की सही सीमा क्या होनी चाहिए?

समाज के कमजोर वर्गों को आगे लाने के लिए
आरक्षण और रियायत जरूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं।

लेकिन सवाल यह है कि
क्या रियायत की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?

डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट जैसे पेशों में
थोड़ी भी कमी बहुत बड़ा खतरा बन सकती है।

अगर रियायत के नाम पर
पूरे सिस्टम को कमजोर किया जाएगा,
तो सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को ही होगा,
क्योंकि अमीर लोग तो प्राइवेट और विदेश में इलाज करवा लेंगे।


ग्रामीण भारत पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर

आज भी गांवों में
सरकारी अस्पतालों की हालत खराब है।
डॉक्टरों की कमी है,
सुविधाएं कम हैं।

अगर अब वहां ऐसे डॉक्टर भेजे जाएंगे
जिनकी ट्रेनिंग ही कमजोर है,
तो गांव के लोग किसके पास जाएंगे?

शहरों में तो फिर भी बड़े अस्पताल हैं,
लेकिन गांव में एक ही डॉक्टर पर
पूरे इलाके की जिम्मेदारी होती है।

अगर वही डॉक्टर कमजोर निकला,
तो पूरा इलाका खतरे में आ जाएगा।


 स्वास्थ्य मंत्रालय से सीधा सवाल

माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी,
यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं,
यह नैतिक जिम्मेदारी का भी सवाल है।

क्या आप अपने परिवार का इलाज
ऐसे डॉक्टर से करवाना चाहेंगे
जो बहुत कम स्कोर के साथ मेडिकल में आया हो?

अगर नहीं,
तो आम जनता के लिए यह क्यों स्वीकार्य हो?

देश को डॉक्टर चाहिए,
लेकिन उससे ज्यादा चाहिए काबिल डॉक्टर।


अगर आज नहीं रोका गया तो कल क्या होगा?

अगर यही नीति चलती रही तो आने वाले समय में:

  • मेडिकल नेग्लिजेंस के केस बढ़ेंगे

  • कोर्ट में डॉक्टरों के खिलाफ मामले बढ़ेंगे

  • मरीज और डॉक्टर के बीच भरोसा टूटेगा

  • लोग सरकारी अस्पतालों से और दूर होंगे

और तब सरकारें बदल जाएंगी,
लेकिन नुकसान जनता का स्थायी होगा।


बेहतर रास्ता क्या हो सकता है?

इस समस्या का समाधान भी संभव है:

  1. कट-ऑफ बहुत नीचे लाने की जगह सीमित छूट

  2. कमजोर छात्रों के लिए ब्रिज कोर्स और दोबारा ट्रेनिंग

  3. सीट बढ़ाने के साथ फैकल्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार

  4. ग्रामीण सेवा से जुड़ा एडमिशन मॉडल

  5. काउंसलिंग से पहले स्किल टेस्ट अनिवार्य

इससे न तो सीटें खाली रहेंगी
और न ही जनता की जान जोखिम में पड़ेगी।


यह सिर्फ छात्रों की लड़ाई नहीं, जनता की लड़ाई है

आज अगर यह फैसला बिना विरोध के स्वीकार कर लिया गया,
तो कल कोई भी नीति जनता की सुरक्षा से खेल सकती है।

आज सवाल मेडिकल का है,
कल किसी और जरूरी सेवा का होगा।

इसलिए जरूरी है कि
सरकार इस फैसले पर दोबारा विचार करे,
और देश के भविष्य को हल्के में न ले।


अंतिम शब्द

डॉक्टर बनने का मतलब सिर्फ करियर नहीं,
यह एक जिम्मेदारी है,
एक सेवा है,
और लाखों जिंदगियों की सुरक्षा का वादा है।

अगर इस वादे में ही कमजोरी आ गई,
तो देश का भरोसा टूट जाएगा।

सरकार से अपील है
कि इस फैसले को तुरंत समीक्षा में लिया जाए,
क्योंकि यह फैसला
सीधे जनता की सांसों से जुड़ा है।

अगर आप चाहते हैं कि हमारे देश में डॉक्टर सिर्फ डिग्री से नहीं, काबिलियत से बनें, तो इस रिपोर्ट को शेयर करें, अपनी राय लिखें और इस मुद्दे को सरकार तक पहुंचाएं। आपकी एक आवाज़ भी बदलाव ला सकती है।


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