बिहार के 70% किसान जमीन के मालिक नहीं, फिर Farmer ID कैसे बने? अब समाधान की ओर बढ़ता बिहार
✍️लेखक : कृष्ण कुमार | TezBreaking24 |
बिहार के गांवों में आज भी लाखों किसान ऐसे हैं जो पीढ़ियों से खेती कर रहे हैं, लेकिन कागजों में उनकी जमीन आज भी उनके दादा या परदादा के नाम पर दर्ज है. जमीन उनकी, मेहनत उनकी, फसल उनकी, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वे किसान ही नहीं माने जाते. यही सबसे बड़ी वजह है कि आज हजारों किसान Farmer ID नहीं बनवा पा रहे और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं से बाहर हो रहे हैं.
यह सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि किसान की पहचान और सम्मान से जुड़ा मुद्दा है.
जमीन है लेकिन नाम नहीं, यही असली संकट
ग्रामीण बिहार की हकीकत यह है कि जमीन का बंटवारा तो परिवार में हो जाता है, लेकिन सरकारी कागजों में नाम चढ़ाने की प्रक्रिया सालों तक टलती रहती है. कारण साफ हैं:
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कानूनी प्रक्रिया जटिल लगती है
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दफ्तरों के चक्कर और खर्च का डर
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परिवार में आपसी सहमति नहीं बन पाती
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कई बार रिकॉर्ड ही गलत होते हैं
नतीजा यह होता है कि जो किसान रोज खेत में पसीना बहा रहा है, वही सरकारी सिस्टम में अदृश्य बना रहता है.
Farmer ID क्यों बन गई है सबसे बड़ी जरूरत
अब केंद्र सरकार ज्यादातर कृषि योजनाओं को Farmer ID से जोड़ रही है. इसका मकसद है कि फर्जी लाभार्थी हटें और पैसा सही किसान तक पहुंचे. लेकिन Farmer ID तभी बनेगी जब:
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जमीन का रिकॉर्ड किसान के नाम पर होगा
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आधार और बैंक खाता लिंक होगा
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भूमि डेटा डिजिटल सिस्टम में सही होगा
यहीं पर बिहार का किसान फंस जाता है, क्योंकि पहला ही स्टेप अधूरा है.
PM किसान निधि पर भी मंडरा रहा खतरा
PM किसान सम्मान निधि की राशि साल में तीन किस्तों में मिलती है. लेकिन जिन किसानों की Farmer ID नहीं बन पा रही, उनके लिए खतरा बढ़ता जा रहा है कि:
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अगली किस्त रोकी जा सकती है
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नया रजिस्ट्रेशन संभव नहीं होगा
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पुराने लाभार्थियों की जांच सख्त होगी
इसका मतलब यह कि जो किसान पहले से ही महंगाई और मौसम से जूझ रहा है, उसकी मदद भी रुक सकती है.
भूमि सुधार विभाग की जिम्मेदारी अब और बढ़ी
यहीं से बिहार के भूमि सुधार विभाग और मंत्री विजय कुमार सिन्हा की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. किसान अब सिर्फ योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर काम चाहता है.
अगर सरकार सच में चाहती है कि किसान को उसका हक मिले, तो सिर्फ ऑनलाइन पोर्टल काफी नहीं होंगे. इसके लिए गांव तक पहुंचने वाली ठोस व्यवस्था चाहिए.
समाधान क्या हो सकता है: सिर्फ नियम नहीं, राहत चाहिए
✅ 1. गांव स्तर पर भूमि समाधान शिविर
हर पंचायत में महीने में कम से कम एक दिन ऐसा हो जब:
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नामांतरण के आवेदन लिए जाएं
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दस्तावेज तुरंत जांचे जाएं
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मौके पर सुधार दर्ज हो
इससे किसान को ब्लॉक और जिला के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे.
✅ 2. पारिवारिक सहमति की सरल प्रक्रिया
अक्सर जमीन इसलिए ट्रांसफर नहीं होती क्योंकि:
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भाई-भाई में सहमति नहीं
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परिवार में विवाद
सरकार को चाहिए कि सहमति पत्र की सरल व्यवस्था बनाए, जिसमें गांव के स्तर पर ही सत्यापन हो सके ताकि मामला कोर्ट तक न जाए.
✅ 3. डिजिटल रिकॉर्ड में मानवीय मदद जरूरी
आज सब कुछ ऑनलाइन है, लेकिन:
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बहुत से किसान मोबाइल नहीं चला पाते
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वेबसाइट अंग्रेजी में होती है
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साइबर कैफे पर ज्यादा पैसे लगते हैं
हर प्रखंड में स्थायी भूमि सहायता केंद्र होना चाहिए, जहां किसान को मुफ्त में मदद मिले.
✅ 4. Farmer ID कैंप को जमीन सुधार से जोड़ा जाए
आज Farmer ID के कैंप तो लगते हैं, लेकिन अगर जमीन का रिकॉर्ड गलत है तो वहां भी किसान खाली हाथ लौटता है.
अगर Farmer ID कैंप के साथ ही:
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नामांतरण
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रिकॉर्ड सुधार
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आधार लिंकिंग
तीनों सुविधा एक साथ मिलें, तभी असली फायदा होगा.
कानून से ज्यादा भरोसे की जरूरत
किसान को सिर्फ फॉर्म और पोर्टल नहीं चाहिए, उसे यह भरोसा चाहिए कि:
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उसकी जमीन कोई छीन नहीं पाएगा
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रिकॉर्ड सही हो जाएगा
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सरकारी सिस्टम उसके साथ है
अगर यह भरोसा नहीं बना, तो किसान योजनाओं से और दूर होता जाएगा.
Farmer ID सिर्फ कार्ड नहीं, किसान की पहचान है
Farmer ID का मतलब है:
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सरकारी योजना का हक
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बैंक से कर्ज लेने की सुविधा
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फसल बीमा का लाभ
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सब्सिडी में प्राथमिकता
यानी यह किसान के भविष्य की चाबी है. अगर यह चाबी जमीन के रिकॉर्ड की वजह से अटक जाए, तो पूरा सिस्टम ही अधूरा रह जाता है.
मंत्री विजय सिन्हा से किसानों की उम्मीद
किसान आज यह नहीं पूछ रहा कि योजना कब आएगी, वह पूछ रहा है:
"मेरी जमीन मेरे नाम कब होगी?"
अगर भूमि सुधार विभाग:
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फील्ड लेवल पर निगरानी बढ़ाए
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अधिकारियों की जवाबदेही तय करे
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शिकायतों का समयबद्ध निपटारा करे
तो लाखों किसान Farmer ID बनवाकर योजनाओं से जुड़ सकते हैं.
अगर अब नहीं सुधरा सिस्टम, तो बढ़ेगी ग्रामीण गरीबी
जमीन रिकॉर्ड की समस्या सिर्फ कागज की नहीं है, इसका सीधा असर पड़ता है:
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किसान की आमदनी पर
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सरकारी मदद पर
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खेती में निवेश पर
अगर किसान सरकारी सिस्टम से कटता गया, तो गांव और ज्यादा कमजोर होंगे और युवा खेती छोड़कर पलायन करेंगे.
अब जरूरत है मिशन मोड में काम की
सरकार को यह मुद्दा ऐसे देखना होगा जैसे:
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बिजली कनेक्शन अभियान
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राशन कार्ड सुधार अभियान
यानी एक राज्यव्यापी भूमि सुधार मिशन, जिसमें तय समयसीमा हो और हर जिले की जवाबदेही तय हो.
निष्कर्ष: किसान का हक कागज से नहीं, फैसले से मिलेगा
बिहार का किसान मेहनती है, धैर्यवान है, लेकिन वह अनदेखा नहीं रहना चाहता. जमीन उसके नाम पर हो, Farmer ID बने, PM किसान की राशि मिले, यह कोई एहसान नहीं बल्कि उसका अधिकार है.
अगर भूमि रिकॉर्ड की जड़ समस्या हल हो जाए, तो आधी सरकारी योजनाएं अपने आप सफल हो जाएंगी.
अब गेंद सरकार के पाले में है. किसान देख रहा है, इंतजार कर रहा है और उम्मीद कर रहा है कि उसकी पहचान सिर्फ खेत में नहीं, सरकारी फाइलों में भी दर्ज होगी.
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