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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

नशा और गलत संगत कैसे बना रही है नाबालिगों को अपराधी? जानिए क्यों बढ़ रहा है किशोर अपराध और क्या है समाधान

 न बालिग, न मजबूत सिस्टम… फिर भी अपराध की राह पर: नशा और गलत संगत कैसे बर्बाद कर रही है हमारे किशोरों की जिंदगी


✍️लेखक कृष्ण कुमार | TezBreaking24 | मधेपुरा, बिहार

आज अगर आप किसी भी शहर, कस्बे या गांव में जाएं, तो एक बात कॉमन दिखेगी।
12 से 17 साल के लड़के, जो अभी स्कूल में होने चाहिए थे, वो गली के कोनों पर खड़े मिलेंगे। कुछ मोबाइल में डूबे होंगे, कुछ बाइक पर घूमते दिखेंगे और कुछ ऐसे चेहरे भी मिलेंगे जिनकी आंखों में नशे की थकान साफ नजर आती है। यही उम्र है जब जिंदगी बनती है, लेकिन अफसोस, यही उम्र अब अपराध की तरफ मुड़ती जा रही है।

यह सिर्फ एक जिले या एक राज्य की समस्या नहीं है। यह एक खामोश सामाजिक आपातकाल है, जिस पर जितना बोलना चाहिए, उतना बोला नहीं जा रहा।

नशे की शुरुआत छोटी, लेकिन पकड़ बहुत मजबूत

अधिकतर बच्चों के साथ कहानी एक जैसी होती है।
पहले दोस्त के साथ गुटखा या सिगरेट, फिर कभी-कभी गांजा, और फिर कुछ ही महीनों में शरीर और दिमाग दोनों को नशे की जरूरत पड़ने लगती है। जब जेब में पैसा नहीं होता, तब दिमाग एक ही सवाल पूछता है, पैसा कहां से आएगा?

यहीं से शुरू होती है चोरी, मोबाइल छिनतई, बाइक पार्ट्स चुराना, और धीरे-धीरे बड़े अपराधों से जुड़ाव। बच्चा अपराध इसलिए नहीं करता कि वो बुरा है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि नशा अब उसकी जरूरत बन चुका होता है।

गलत संगत: अकेला बच्चा नहीं, पूरा नेटवर्क

आज अपराध अकेले नहीं होते, नेटवर्क में होते हैं।
मोहल्लों में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बच्चों को इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि नाबालिग होने पर सजा कम होगी। ड्रग्स पहुंचाना हो, चोरी का सामान लाना हो या रेकी करनी हो, आगे बच्चे ही भेजे जाते हैं।

बच्चा धीरे-धीरे उस माहौल को ही अपनी दुनिया मान लेता है। उसे लगता है कि यही ताकत है, यही पहचान है। स्कूल, परिवार और सही दोस्त सब पीछे छूट जाते हैं।

स्कूल से बाहर, समाज के बाहर

कई बच्चे अपराध की तरफ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि वे स्कूल से बाहर हो चुके होते हैं।
कभी फीस की वजह से, कभी बार-बार फेल होने से, तो कभी टीचर्स के तानों से। जब बच्चा स्कूल छोड़ देता है, तब उसके पास दिनभर खाली समय होता है और यही समय गलत रास्ते की तरफ ले जाता है।

स्कूल सिर्फ किताबें पढ़ाने की जगह नहीं है, बल्कि बच्चों को सही दिशा देने की सबसे मजबूत जगह भी है। लेकिन जब यही सिस्टम बच्चे को पहचान ही नहीं पाता कि कौन बच्चा टूट रहा है, तब नुकसान तय हो जाता है।

माता-पिता की मजबूरी और सिस्टम की बेरुखी

अधिकतर परिवारों में माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं या रोज कमाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। बच्चों के साथ बैठकर बात करने का समय ही नहीं मिल पाता। बच्चा किससे मिल रहा है, क्या देख रहा है, क्या कर रहा है, ये सब धीरे-धीरे नजर से बाहर हो जाता है।

मोबाइल यहां सबसे बड़ा रोल निभा रहा है।
गलत वीडियो, हिंसक कंटेंट और गलत लोग, सब कुछ एक क्लिक दूर है। बच्चा जो देखता है, वही सीखता है और वही करने की कोशिश करता है।

कानून की सीमाएं और अपराधियों की चाल

कानून बच्चों को सुधारने के लिए बना है, सजा देने के लिए नहीं। लेकिन अपराधी इसी बात का फायदा उठाते हैं। वे जानते हैं कि नाबालिगों को आगे करने से वे खुद बच सकते हैं।

यहां असली जरूरत है कि कानून के साथ-साथ सामाजिक निगरानी और प्रशासनिक सक्रियता भी हो, ताकि बच्चों को इस्तेमाल करने वाले असली गुनहगार पकड़े जाएं।

हर अपराध से पहले कई चेतावनियां मिलती हैं, लेकिन कोई सुनता नहीं

किसी भी बच्चे के अपराधी बनने से पहले संकेत मिलते हैं:

  • अचानक चिड़चिड़ापन

  • पढ़ाई से दूरी

  • नए और संदिग्ध दोस्त

  • पैसों की जरूरत बढ़ना

  • घर में झूठ बोलना

लेकिन अक्सर इन संकेतों को “बचपना” कहकर टाल दिया जाता है। जब तक मामला थाने तक पहुंचता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


अब सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है, सवाल यह है कि समाधान क्या है

1. मोहल्ला स्तर पर खेल और स्किल सेंटर जरूरी

अगर हर वार्ड और पंचायत में:

  • खेल का मैदान

  • कंप्यूटर या स्किल क्लास

  • शाम के समय एक्टिविटी सेंटर हों

तो बच्चे अपने आप गलत जगहों से दूर रहेंगे। खाली दिमाग को सही काम मिल जाए तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाती है।

2. नशा बेचने वालों पर सख्त और लगातार कार्रवाई

अक्सर होता यह है कि पुलिस छोटे नशेड़ी को पकड़ लेती है, लेकिन सप्लाई करने वाला बच जाता है। जब तक सप्लाई चैन बंद नहीं होगी, तब तक बच्चे बच नहीं पाएंगे।

स्थानीय लोगों को भी डर छोड़कर जानकारी देनी होगी, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ पुलिस की नहीं, पूरे समाज की है।

3. स्कूलों में काउंसलिंग को मजाक नहीं, जरूरत समझा जाए

हर स्कूल में ऐसे शिक्षक या काउंसलर होने चाहिए जो सिर्फ पढ़ाई नहीं, बच्चों की मानसिक हालत भी समझें। जो समय रहते पहचान सकें कि कौन बच्चा गलत रास्ते की तरफ जा रहा है।

डांटना आसान है, समझाना मुश्किल। लेकिन बदलाव समझाने से ही आएगा।

4. माता-पिता के लिए भी जागरूकता जरूरी

सरकार और समाज को सिर्फ बच्चों को नहीं, माता-पिता को भी बताना होगा कि:

  • बच्चों से रोज बात क्यों जरूरी है

  • मोबाइल पर नजर कैसे रखें

  • दोस्ती के नाम पर क्या चल रहा है, कैसे पहचानें

कई बार एक छोटी सी बातचीत, एक बड़ा अपराध रोक सकती है।

5. सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर दिखें

स्किल ट्रेनिंग, स्पोर्ट्स स्कॉलरशिप, अप्रेंटिसशिप जैसे कई प्रोग्राम हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में बच्चे इनसे जुड़ नहीं पाते। पंचायत, स्कूल और स्थानीय प्रशासन को मिलकर यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि कोई भी बच्चा सिर्फ जानकारी की कमी से गलत रास्ते पर न जाए।


अगर आज नहीं संभले, तो कल सिर्फ खबरें बचेंगी

आज जो बच्चा बाइक चोरी कर रहा है, कल वही बड़ी वारदात में शामिल मिलेगा। फिर हम कहेंगे कि अपराध बढ़ गया है, कानून फेल हो गया है, पुलिस कुछ नहीं कर रही।

लेकिन सच यह है कि अपराध उस दिन नहीं शुरू होता, जिस दिन FIR दर्ज होती है। अपराध उस दिन शुरू होता है, जब एक बच्चा पहली बार नशा करता है और कोई उसे रोकने वाला नहीं होता।

आखिरी बात, जो हर घर को समझनी चाहिए

हर अपराधी पहले एक बच्चा होता है।
अगर हम समय रहते उसे पकड़ लें, समझा लें, रास्ता दिखा दें, तो वही बच्चा कल समाज का मजबूत हिस्सा बन सकता है।

यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, यह हमारी, आपकी और पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
क्योंकि अगर हम अपने बच्चों को नहीं बचा पाए, तो कोई सिस्टम हमें सुरक्षित नहीं रख पाएगा।


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